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बिखरे हुए कांच के मेरे दिल के टुकड़ों पे चल के आनामुझे तक पहुंचने का कोई और रास्ता नहीं है! […]

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दामन में मेरे दाग़ क्या कम थे पहले?के सीने में खंजर डाल कर पूछते हो ‘सब सुकूं से तो है’?

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मैं भी चाहता हूं तू शर्मिंदा न हो पर कहां जाकर बैठूं तू जहां न हो – राकेश शुक्ल ‘मनु’

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जो गुनाह नहीं किए मैंने उनकी भी तुमसे सज़ा चाहता हूं चाहा था तुझे छोड़ कुछ दिखाई न दे नजरें

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हकीमों दवाखानों में गुजार दी तूने तमाम उम्र ‘मनु’ पर जब भी गिरेबां में देखा दिल के ज़ख्म हरे ही

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रिश्ते तब तक ही रहते हैं जब तक उनको तोड़ना मुश्किल हो यादों का सिलसिला भी टूट जाता है यकीनन

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मैं जानता हूं तू एक बार फिर आएगा बस यही नहीं कब और किधर आएगा जिंदगी से जीता पर तुझसे

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अहमकों को प्यार का हक नहीं होता अगर दिल साफ हो लेकिन जबान नहीं तो लाख दलीलों पर भी दिल

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तुझसे बिछड़ने का दर्द इतना था की कई बार कोशिश की कि मर ही जाते फिर भी तमाम उम्र लग

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जिसको मां का तिरस्कार मिला हो वो औरों में प्यार खोजता है उसका पागलपन कोई नहीं सहेगा लेकिन फिर भी

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