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मैं रोज़ हार जाता हूं काम पर जाते समय अपने आप को कहता हूं की तेरी बनाई रोटी की याद […]

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तुझे ही सोचकर ठंडक मिलती है तुझी को सोचकर दिल जलता है – राकेश शुक्ल ‘मनु’

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तेरा करम न हुआ न सही लेकिन सजदे में थे तेरे ज़बह करने से पहले काफ़िर तो न बुलाया होता

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एक दिन मैं तुझे छोड़ जाऊंगा तू तो वैसे भी बहुत दूर निकल गया मैं भी कोई और मोड़ लूंगा,

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गर मालूम होता मौत लावारिस होनी थीतेरी आगोश की जगह कब्र ढूंढते – राकेश शुक्ल ‘मनु’

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तमाम उम्र तेरे सजदे के बाद भी काफ़िर ही कहलाए हम,शायद मुझे ज़बह कर के तुझे मेरे ईमान का यकीन

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ख़्वाब ख़्वाब तो हमने भी देखे थे हर सुबह तेरे बदन की महक के हर दिन तेरे इंतजार के दफ़्तर

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तू मुझसे खफा है, मैं भी अपने आप से तूने कहा सब झूठा है, सब सारी बातें सब कसमें, वो

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बिखरे हुए कांच के मेरे दिल के टुकड़ों पे चल के आनामुझे तक पहुंचने का कोई और रास्ता नहीं है!

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