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सोचा तो था तेरा दर ही मेरा मकाम होगा तेरी आगोश ही आखिरी पैगाम होगा अब बेसबब भटकतां हूं ऐसे […]

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तेरे मिलने की चाहत में मुद्दत गुज़र गईआखिर जब तूने बुलाया घर में आग लगी थी– राकेश शुक्ल ‘मनु’

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अकेलापन है, पर फिर भी कम है ‘मनु’ अपने आप से फ़िराक चाहता है खुशी का शोर सहा नहीं जाता

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तुझे ही सोचकर ठंडक मिलती है तुझी को सोचकर दिल जलता है – राकेश शुक्ल ‘मनु’

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तेरा करम न हुआ न सही लेकिन सजदे में थे तेरे ज़बह करने से पहले काफ़िर तो न बुलाया होता

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एक दिन मैं तुझे छोड़ जाऊंगा तू तो वैसे भी बहुत दूर निकल गया मैं भी कोई और मोड़ लूंगा,

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गर मालूम होता मौत लावारिस होनी थीतेरी आगोश की जगह कब्र ढूंढते – राकेश शुक्ल ‘मनु’

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कभी दुनिया से हार कर तेरी आगोश में छुपता था,आज तुझे हार कर भीड़ में छुपा बैठा हूं! – राकेश

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तमाम उम्र तेरे सजदे के बाद भी काफ़िर ही कहलाए हम,शायद मुझे ज़बह कर के तुझे मेरे ईमान का यकीन

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ख़्वाब ख़्वाब तो हमने भी देखे थे हर सुबह तेरे बदन की महक के हर दिन तेरे इंतजार के दफ़्तर

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